राजस्थानः गुजरात में गहलोत का जादू बेअसर? जानें प्रदेश में सियासी असर

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Rajasthan News: गुजरात चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस को पटखनी दी. नतीजों को ठीक से समझे तो अब मोदी के गढ़ में राहुल गांधी की पार्टी का अस्तित्व खतरे में है. वहीं, गुजरात जिसमें पिछले चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी को 99 पर रोक लिया था. जिसका सेहरा सजा था प्रभारी अशोक गहलोत के सिर पर. लेकिन इस बार राजनीति के जादूगर गहलोत का जादू नहीं चल पाया. इधर, हिमाचल में पायलट की सभाओं में उमड़ी भीड़ और फिर मतदाताओं के रुझान ने उनकी राजनैतिक प्रतिभा को साबित किया है. वहां कांटे की टक्कर में कांग्रेस बीजेपी पर भारी दिखी. गुजरात चुनाव में कांग्रेस सिमट कर रह गई है.

नतीजों को ठीक से समझे तो अब मोदी के गढ़ में राहुल गांधी की पार्टी का अस्तित्व खतरे में है. वहीं, गुजरात जिसमें पिछले चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी को 99 पर रोक लिया था. जिसका सेहरा सजा प्रभारी अशोक गहलोत के सिर पर. लेकिन इस बार कांग्रेस सिमट कर रह गई है. साल 2013 में राजस्थान चुनाव हारने के बाद गहलोत ने 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में ताकत दिखाई.

जिसके बाद 2018 के दौरान प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत हासिल होने के बाद गहलोत सीएम बने. ऐसे में पड़ोसी राज्य के ताजा सियासी घटनाक्रम का असर राजस्थान पर होगा. शायद इसका असर गहलोत की कुर्सी पर होगा. कांग्रेस ने गुजरात चुनाव के लिए सीएम गहलोत को सीनियर ऑब्जर्वर बनाया है. चुनाव की पूरी जिम्मेदारी गहलोत पर ही थी.

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यहां तक कि गहलोत ने गुजरात जीतने के लिए 15 से ज्यादा अ पने मंत्रियों को मैदान में उतार दिया. गहलोत के खास रघु शर्मा को गुजरात में कांग्रेस के प्रभारी बनाए गए. लेकिन यह प्रयोग अब फेल हो चुका है. सवाल यह है कि साल 2017 में गुजरात में दम दिखा चुके गहलोत के सिर इस हार का ठीकरा फूटेगा?

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गुजरात चुनाव खत्म, फिर से उठेगी सीएम बदलने की मांग?
जयपुर में 25 सितंबर को हुए घटनाक्रम के बाद से ही गहलोत की कुर्सी एक बार फिर खतरे में आ गई. सचिन पायलट खेमा लगातार दिल्ली दरबार को अपने पक्ष में करता दिखा. गुजरात के 51 शहरों में 15 लाख से ज्यादा राजस्थानी रहते हैं. जिसके चलते हाईकमान ने गहलोत के जरिए इस वोट बैंक को साधने की कोशिश की. लेकिन यहां कोई कमाल नहीं कर पाई. मायने यह भी निकाले गए कि गुजरात चुनाव की वजह से कांग्रेस हाईकमान ने चुप्पी साध रखी है. अब जब चुनाव हो गए है. तो क्या फिर से सीएम बदलने की मांग शुरू हो जाएगी?

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पायलट ने किया था हिमाचल में धुआंधार प्रचार
दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश में राज्य के पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट शामिल थे. जिन्हें आलाकमान ने सचिन पायलट को हिमाचल प्रदेश का पर्यवेक्षक बनाकर भेजा था. जिन्होंने चुनावों के दौरान धुंआधार 40 से अधिक रैलियां और सभाएं की थी. इस बार पहाड़ी क्षेत्र में कांग्रेस ने भाजपा को कांटे की टक्कर दी और सरकार बनाने के करीब है. खास बात इसलिए भी क्योंकि पिछली बार हिमाचल में भाजपा ने 44 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि कांग्रेस के खाते में 21 सीटें गईं थीं.

 

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